लंबी अवधि के ETF निवेश में कम सहसंबंध वाली रणनीतियों की भूमिका
लंबी अवधि के लिए एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) में निवेश करना शेयर बाज़ार की बढ़त में भागीदारी करने का एक आसान और प्रभावी तरीका है। लेकिन दर्जनों या सैकड़ों कंपनियों में निवेश होने के बावजूद, किसी बड़े बाज़ार संकट के दौरान आपके पोर्टफोलियो की वैल्यू में भारी गिरावट आ सकती है।
जैसे-जैसे आपका निवेश पोर्टफोलियो बड़ा होता है, सिर्फ़ यह पूछना काफ़ी नहीं रह जाता कि “ज़्यादा रिटर्न कैसे मिले?” एक और सवाल उतना ही ज़रूरी हो जाता है: क्या मेरा पोर्टफोलियो शेयर बाज़ार के प्रदर्शन पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर है?
इसका मतलब यह नहीं कि ETF में निवेश करना गलत है। सवाल यह है कि क्या रिटर्न के दूसरे स्रोत, खासकर कम सहसंबंध वाली रणनीतियाँ, आपके पोर्टफोलियो में बेहतर विविधीकरण ला सकती हैं।
मसलन, अमेरिका की बड़ी कंपनियों में निवेश करने वाला ETF और टेक्नोलॉजी सेक्टर का ETF अलग-अलग इंडेक्स ट्रैक कर सकते हैं। फिर भी दोनों पर एक जैसे आर्थिक कारकों का असर पड़ सकता है और बाज़ार में व्यापक बिकवाली के दौरान दोनों साथ गिर सकते हैं।
कई ETF रखने का मतलब यह नहीं कि आपके पास रिटर्न के कई स्वतंत्र स्रोत भी हैं।
पिछले बाज़ार संकट बताते हैं कि व्यापक विविधीकरण वाले इक्विटी ETF भी 50% से अधिक की गिरावट का सामना कर चुके हैं।
प्रमुख ऐतिहासिक गिरावट की अवधियाँ: SPY (2007–2009), QQQ (2000–2002), VOO (2020) और ताइवान 0050 (2008)।
आँकड़ों के बारे में: चार्ट में प्रत्येक ETF के लॉन्च होने के बाद से दर्ज अधिकतम ड्रॉडाउन के अनुमानित आँकड़े दिए गए हैं। सभी ETF की उपलब्ध ऐतिहासिक अवधि एक जैसी नहीं है। डिविडेंड एडजस्टमेंट, डेटा की आवृत्ति और गणना की पद्धति के कारण नतीजे भी अलग हो सकते हैं। इसलिए केवल इन आँकड़ों के आधार पर ETF के जोखिम की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा।
किसी ETF के लॉन्च होने के बाद दर्ज सबसे बड़ी गिरावट, उसके अंतर्निहित बाज़ार के पूरे इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट हो—यह ज़रूरी नहीं है।
VOO को ही लें। यह ETF 2010 में लॉन्च हुआ था, इसलिए इसने 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट नहीं झेला। लेकिन जिस S&P 500 इंडेक्स को यह ट्रैक करता है, उसमें उस संकट के दौरान कहीं बड़ी गिरावट आई थी। उस दौर को समझने के लिए पुराने ETF SPY या S&P 500 के ऐतिहासिक इंडेक्स डेटा का उपयोग किया जा सकता है।
ताइवान 0050 के मामले में भी यही सीमा है। यह ETF 2003 में लॉन्च हुआ था, इसलिए इसका वास्तविक प्रदर्शन रिकॉर्ड ताइवान के उससे पहले के बड़े मंदी के दौरों को नहीं दिखाता। उदाहरण के लिए, 1990 में ताइवान के शेयर बाज़ार का बुलबुला फूटने के बाद प्रमुख बाज़ार सूचकांक TAIEX लगभग 80% गिर गया था। यह व्यापक बाज़ार सूचकांक की ऐतिहासिक गिरावट थी, न कि ताइवान 0050 का वास्तविक या अनुमानित ड्रॉडाउन।
इससे एक बात साफ़ होती है: किसी फंड का ट्रैक रिकॉर्ड छोटा होने या उसके इतिहास में बड़ा बाज़ार संकट न आने का मतलब यह नहीं कि भविष्य में उसका जोखिम कम होगा।
इसलिए ETF का जोखिम समझते समय सिर्फ़ फंड का अपना प्रदर्शन देखना पर्याप्त नहीं है। जिस बाज़ार या इंडेक्स को वह ट्रैक करता है, उसके लंबे इतिहास और अलग-अलग आर्थिक चक्रों को देखना भी उपयोगी है।
इसका उद्देश्य लंबी अवधि के ETF निवेश की उपयोगिता पर सवाल उठाना नहीं है। बात सिर्फ़ इतनी है कि लंबी अवधि में मिलने वाला रिटर्न और उस रिटर्न तक पहुँचने के दौरान उठाना पड़ने वाला अधिकतम नुकसान, दो अलग बातें हैं।
जिन निवेशकों का पोर्टफोलियो बड़ा हो चुका है, जो रिटायरमेंट के करीब हैं या जिन्हें निवेश से नियमित पैसा निकालना है, उनके लिए भारी गिरावट सिर्फ़ कागज़ी नुकसान नहीं होती। इसका असर उनकी वित्तीय योजनाओं पर भी पड़ सकता है।
ऐसे में एक सवाल विचार करने लायक है: क्या रिटर्न के दूसरे स्रोत जोड़कर पोर्टफोलियो की शेयर बाज़ार पर निर्भरता कम की जा सकती है?
वित्तीय विश्लेषण में सहसंबंध गुणांक -1 से +1 के बीच होता है। इसे तीन स्थितियों से समझ सकते हैं:
कम सहसंबंध और नकारात्मक सहसंबंध एक ही बात नहीं हैं।
इक्विटी ETF में निवेश करने वालों के लिए यह अंतर समझना बेहद ज़रूरी है।
कम सहसंबंध वाली रणनीति का मतलब यह नहीं कि “शेयर बाज़ार गिरेगा तो यह ज़रूर मुनाफ़ा देगी।” इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि इस रणनीति का रिटर्न हमेशा शेयर बाज़ार की दिशा का अनुसरण नहीं करता।
शेयर बाज़ार और किसी क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग रणनीति का ऐतिहासिक सहसंबंध शून्य के करीब होने पर भी दोनों में एक साथ नुकसान हो सकता है। इसी तरह, पहले नकारात्मक सहसंबंध रहा हो तो भी हर बाज़ार गिरावट में सुरक्षा मिलने की गारंटी नहीं होती।
असली संभावित फायदा उन रिटर्न स्रोतों को साथ रखने में है जो हमेशा एक जैसे नहीं चलते। यह उम्मीद करना सही नहीं होगा कि एक निवेश दूसरे के हर नुकसान की भरपाई कर देगा।
मान लीजिए आपके पास निवेश के दो विकल्प हैं:
अगर पूरा पोर्टफोलियो इक्विटी ETF में निवेशित हो, तो इस उदाहरण में उसकी वार्षिकीकृत वोलैटिलिटी 20% होगी।
लेकिन इन्हीं मान्यताओं के आधार पर 80% ETF और 20% वैकल्पिक रणनीति का आवंटन करने पर पोर्टफोलियो की वोलैटिलिटी घटकर लगभग 16.3% हो सकती है। वहीं 60% ETF और 40% वैकल्पिक रणनीति के आवंटन पर यह लगभग 13.4% रह सकती है।
सवाल यह है कि जब दूसरा निवेश भी उतार-चढ़ाव वाला है, तो उसे जोड़ने से कुल उतार-चढ़ाव कम कैसे हो सकता है?
क्योंकि पोर्टफोलियो का जोखिम सिर्फ़ अलग-अलग निवेशों की वोलैटिलिटी पर निर्भर नहीं करता। यह भी मायने रखता है कि उनके रिटर्न एक-दूसरे के मुकाबले कैसे बदलते हैं।
जब दो निवेश हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते, तो कुछ उतार-चढ़ाव एक-दूसरे के असर को आंशिक रूप से कम कर सकते हैं। इससे पूरे पोर्टफोलियो की वैल्यू में होने वाला उतार-चढ़ाव घट सकता है।
यही कम सहसंबंध वाली रणनीतियों का संभावित विविधीकरण लाभ है।
हालाँकि, चार्ट में दिए गए आँकड़े कुछ निश्चित मान्यताओं पर आधारित गणितीय उदाहरण हैं, किसी वास्तविक ट्रेडिंग रणनीति के नतीजे नहीं। कम वोलैटिलिटी का मतलब यह नहीं कि अधिकतम ड्रॉडाउन भी ज़रूर कम होगा या रिटर्न बढ़ेगा।
असल मूल्यांकन यह है कि नई रणनीति जोड़ने के बाद रिटर्न, शुल्क, ट्रेडिंग लागत और जोखिम को ध्यान में रखते हुए आपका कुल पोर्टफोलियो पहले से बेहतर होता है या नहीं।
मकसद हमेशा सबसे अधिक रिटर्न देने वाला निवेश खोजना नहीं, बल्कि ऐसे रिटर्न स्रोतों को मिलाना है जो पोर्टफोलियो में एक-दूसरे की उपयोगिता बढ़ा सकें।
मान लीजिए किसी पोर्टफोलियो की वैल्यू 1 करोड़ से घटकर 80 लाख रह जाती है। यह 20% की गिरावट है। लेकिन 80 लाख से वापस 1 करोड़ तक पहुँचने के लिए 20% नहीं, बल्कि 25% की बढ़त चाहिए।
10% के नुकसान की भरपाई के लिए लगभग 11.1% बढ़त चाहिए। 30% की गिरावट के बाद पहले स्तर पर लौटने के लिए करीब 42.9% रिटर्न ज़रूरी है। अगर पोर्टफोलियो अपनी आधी वैल्यू खो दे, यानी 50% गिर जाए, तो उसे पुराने उच्चतम स्तर तक पहुँचने के लिए 100% बढ़ना होगा—यानी दोगुना होना होगा।
ड्रॉडाउन जितना गहरा होगा, नुकसान की भरपाई के लिए उतना ही अधिक रिटर्न चाहिए।
इस नज़रिए से पहले भाग में दिखाए गए ETF के ऐतिहासिक ड्रॉडाउन और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। लंबी अवधि में अच्छी संभावनाओं वाला निवेश भी ऐसी गिरावट झेल सकता है जिससे उबरने में कई साल लग जाएँ।
जिन निवेशकों को पोर्टफोलियो से नियमित पैसा निकालना है या तय समय पर वित्तीय ज़िम्मेदारियाँ पूरी करनी हैं, उनके लिए लंबा रिकवरी पीरियड खास तौर पर मुश्किल हो सकता है।
इसलिए लंबी अवधि की निवेश रणनीति केवल अधिक रिटर्न पाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। संभावित नुकसान कितना बड़ा हो सकता है और उसका क्या असर पड़ेगा, यह समझना भी उतना ही ज़रूरी है।
उचित रिटर्न का लक्ष्य रखते हुए बड़े ड्रॉडाउन के जोखिम को संभालना, लंबी अवधि की वित्तीय योजनाओं पर टिके रहने में मदद कर सकता है।
रिटर्न के अलग-अलग स्रोतों पर विचार करने की यह भी एक वजह है। उद्देश्य किसी ऐसी रणनीति की तलाश नहीं है जिसमें कभी नुकसान न हो, बल्कि ऐसे संयोजन की संभावना जाँचना है जो एक ही बाज़ार जोखिम पर निर्भरता कम कर सके।
शुरुआत प्रचार में बताए गए वार्षिक रिटर्न से नहीं, बल्कि जाँचे जा सकने वाले लाइव ट्रेडिंग रिकॉर्ड से करें।
Myfxbook जैसे थर्ड-पार्टी ट्रेडिंग परफ़ॉर्मेंस ट्रैकिंग प्लेटफ़ॉर्म की मदद से निवेशक किसी रणनीति का ट्रेडिंग इतिहास और प्रदर्शन से जुड़े आँकड़े देख सकते हैं। इससे वास्तविक बाज़ार परिस्थितियों में उसके रिटर्न और जोखिम का बेहतर अंदाज़ा मिलता है।
लेकिन किसी थर्ड-पार्टी प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेडिंग रिकॉर्ड का सत्यापन, स्वतंत्र वित्तीय ऑडिट के बराबर नहीं है। इससे भविष्य के नतीजों की कोई गारंटी भी नहीं मिलती।
लाइव ट्रेडिंग रिकॉर्ड वास्तविक सौदों का अधिक प्रत्यक्ष प्रमाण देता है, लेकिन पिछला प्रदर्शन भविष्य के नतीजों की गारंटी नहीं है।
यदि प्रकाशित प्रदर्शन में बैकटेस्ट या सिमुलेशन के नतीजे भी शामिल हैं, तो उन्हें वास्तविक लाइव ट्रेडिंग के नतीजों से स्पष्ट रूप से अलग दिखाया जाना चाहिए।
जिन निवेशकों के पास पहले से ETF हैं, उनके लिए नई रणनीति चुनने का मकसद सिर्फ़ सबसे अधिक रिटर्न खोजना नहीं होना चाहिए। ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि रणनीति स्वीकार्य जोखिम के दायरे में रिटर्न का कोई उपयोगी अतिरिक्त स्रोत दे सकती है या नहीं।
अगर आपके मौजूदा निवेश आपके वित्तीय लक्ष्यों, जोखिम सहने की क्षमता और ज़रूरत पड़ने पर पैसा निकालने की आवश्यकताओं के अनुरूप हैं, तो मौजूदा एसेट एलोकेशन बनाए रखना भी एक समझदारी भरा फैसला हो सकता है।
लेकिन जैसे-जैसे पोर्टफोलियो बड़ा होता है, कुछ सवालों पर विचार करना उपयोगी है:
सिर्फ़ कम सहसंबंध होना किसी रणनीति में निवेश करने की पर्याप्त वजह नहीं है।
नई रणनीति पर तभी विचार करना चाहिए जब उसकी रिटर्न की संभावनाएँ, जोखिम और व्यावहारिक शर्तें निवेशक के वित्तीय लक्ष्यों और सीमाओं के अनुरूप हों।
असली सवाल यह है:
“क्या मेरा पोर्टफोलियो एक जैसे बाज़ार-आधारित रिटर्न स्रोतों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है? क्या कोई अलग रणनीति जोड़कर मैं लंबी अवधि की ग्रोथ का लक्ष्य रखते हुए जोखिम को बेहतर तरीके से संभाल सकता हूँ?”
जिन निवेशकों ने पहले से लंबे समय के लिए ETF में निवेश किया हुआ है, उनके लिए ऐतिहासिक अधिकतम ड्रॉडाउन, रिटर्न के सहसंबंध और अलग-अलग एसेट एलोकेशन के प्रभाव को समझना बेहतर पोर्टफोलियो बनाने की अच्छी शुरुआत है।
कम सहसंबंध वाली रणनीतियों का अध्ययन करते समय तीन प्रमुख बातों से शुरुआत करें:
हम क्वांटिटेटिव रणनीतियों पर शोध, जोखिम प्रबंधन और एसेट एलोकेशन से जुड़े विचारों के आदान-प्रदान का स्वागत करते हैं, ताकि इच्छुक निवेशक अपने विकल्पों का अधिक ठोस आधार पर मूल्यांकन कर सकें।
एक अच्छा पोर्टफोलियो सिर्फ़ रिटर्न कमाने के लिए नहीं बनाया जाता। उसका उद्देश्य लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों तक पहुँचने के रास्ते में आने वाले जोखिमों को संभालना भी है।
जैसे-जैसे आपका निवेश पोर्टफोलियो बड़ा होता है, सिर्फ़ यह पूछना काफ़ी नहीं रह जाता कि “ज़्यादा रिटर्न कैसे मिले?” एक और सवाल उतना ही ज़रूरी हो जाता है: क्या मेरा पोर्टफोलियो शेयर बाज़ार के प्रदर्शन पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर है?
इसका मतलब यह नहीं कि ETF में निवेश करना गलत है। सवाल यह है कि क्या रिटर्न के दूसरे स्रोत, खासकर कम सहसंबंध वाली रणनीतियाँ, आपके पोर्टफोलियो में बेहतर विविधीकरण ला सकती हैं।
1. ETF निवेश में विविधता लाते हैं, लेकिन बाज़ार का जोखिम बना रहता है
इक्विटी ETF कुछ चुनिंदा कंपनियों के शेयरों में पैसा लगाने से पैदा होने वाले जोखिम को कम करते हैं। लेकिन अगर आपके पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा इक्विटी ETF में ही लगा है, तो उसका प्रदर्शन अब भी शेयर बाज़ार की कुल दिशा पर काफी हद तक निर्भर करेगा।मसलन, अमेरिका की बड़ी कंपनियों में निवेश करने वाला ETF और टेक्नोलॉजी सेक्टर का ETF अलग-अलग इंडेक्स ट्रैक कर सकते हैं। फिर भी दोनों पर एक जैसे आर्थिक कारकों का असर पड़ सकता है और बाज़ार में व्यापक बिकवाली के दौरान दोनों साथ गिर सकते हैं।
कई ETF रखने का मतलब यह नहीं कि आपके पास रिटर्न के कई स्वतंत्र स्रोत भी हैं।
प्रमुख ETF में ऐतिहासिक अधिकतम गिरावट (MDD)
अधिकतम ड्रॉडाउन (Maximum Drawdown, MDD) किसी निवेश की वैल्यू में एक निश्चित अवधि के दौरान पिछले उच्चतम स्तर से उसके बाद के न्यूनतम स्तर तक आई सबसे बड़ी गिरावट को दर्शाता है।पिछले बाज़ार संकट बताते हैं कि व्यापक विविधीकरण वाले इक्विटी ETF भी 50% से अधिक की गिरावट का सामना कर चुके हैं।
प्रमुख ऐतिहासिक गिरावट की अवधियाँ: SPY (2007–2009), QQQ (2000–2002), VOO (2020) और ताइवान 0050 (2008)।
आँकड़ों के बारे में: चार्ट में प्रत्येक ETF के लॉन्च होने के बाद से दर्ज अधिकतम ड्रॉडाउन के अनुमानित आँकड़े दिए गए हैं। सभी ETF की उपलब्ध ऐतिहासिक अवधि एक जैसी नहीं है। डिविडेंड एडजस्टमेंट, डेटा की आवृत्ति और गणना की पद्धति के कारण नतीजे भी अलग हो सकते हैं। इसलिए केवल इन आँकड़ों के आधार पर ETF के जोखिम की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा।
किसी ETF के लॉन्च होने के बाद दर्ज सबसे बड़ी गिरावट, उसके अंतर्निहित बाज़ार के पूरे इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट हो—यह ज़रूरी नहीं है।
VOO को ही लें। यह ETF 2010 में लॉन्च हुआ था, इसलिए इसने 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट नहीं झेला। लेकिन जिस S&P 500 इंडेक्स को यह ट्रैक करता है, उसमें उस संकट के दौरान कहीं बड़ी गिरावट आई थी। उस दौर को समझने के लिए पुराने ETF SPY या S&P 500 के ऐतिहासिक इंडेक्स डेटा का उपयोग किया जा सकता है।
ताइवान 0050 के मामले में भी यही सीमा है। यह ETF 2003 में लॉन्च हुआ था, इसलिए इसका वास्तविक प्रदर्शन रिकॉर्ड ताइवान के उससे पहले के बड़े मंदी के दौरों को नहीं दिखाता। उदाहरण के लिए, 1990 में ताइवान के शेयर बाज़ार का बुलबुला फूटने के बाद प्रमुख बाज़ार सूचकांक TAIEX लगभग 80% गिर गया था। यह व्यापक बाज़ार सूचकांक की ऐतिहासिक गिरावट थी, न कि ताइवान 0050 का वास्तविक या अनुमानित ड्रॉडाउन।
इससे एक बात साफ़ होती है: किसी फंड का ट्रैक रिकॉर्ड छोटा होने या उसके इतिहास में बड़ा बाज़ार संकट न आने का मतलब यह नहीं कि भविष्य में उसका जोखिम कम होगा।
इसलिए ETF का जोखिम समझते समय सिर्फ़ फंड का अपना प्रदर्शन देखना पर्याप्त नहीं है। जिस बाज़ार या इंडेक्स को वह ट्रैक करता है, उसके लंबे इतिहास और अलग-अलग आर्थिक चक्रों को देखना भी उपयोगी है।
इसका उद्देश्य लंबी अवधि के ETF निवेश की उपयोगिता पर सवाल उठाना नहीं है। बात सिर्फ़ इतनी है कि लंबी अवधि में मिलने वाला रिटर्न और उस रिटर्न तक पहुँचने के दौरान उठाना पड़ने वाला अधिकतम नुकसान, दो अलग बातें हैं।
जिन निवेशकों का पोर्टफोलियो बड़ा हो चुका है, जो रिटायरमेंट के करीब हैं या जिन्हें निवेश से नियमित पैसा निकालना है, उनके लिए भारी गिरावट सिर्फ़ कागज़ी नुकसान नहीं होती। इसका असर उनकी वित्तीय योजनाओं पर भी पड़ सकता है।
ऐसे में एक सवाल विचार करने लायक है: क्या रिटर्न के दूसरे स्रोत जोड़कर पोर्टफोलियो की शेयर बाज़ार पर निर्भरता कम की जा सकती है?
2. कम सहसंबंध वाली रणनीतियों का क्या फायदा है?
कम सहसंबंध वाली रणनीति की खासियत यह नहीं कि वह अगली बाज़ार गिरावट का समय बता सकती है। इसका संभावित फायदा यह है कि वह ऐसा रिटर्न दे सकती है जो पूरी तरह शेयरों की बढ़ती कीमतों पर निर्भर न हो।कम और नकारात्मक सहसंबंध में क्या अंतर है?
सहसंबंध (Correlation) बताता है कि दो निवेशों के रिटर्न एक-दूसरे के साथ किस हद तक और किस दिशा में बदलते हैं।वित्तीय विश्लेषण में सहसंबंध गुणांक -1 से +1 के बीच होता है। इसे तीन स्थितियों से समझ सकते हैं:
- सकारात्मक सहसंबंध (+1 के करीब): दोनों निवेशों के रिटर्न आमतौर पर एक ही दिशा में चलते हैं। यानी दोनों साथ बढ़ सकते हैं या साथ गिर सकते हैं।
- कम सहसंबंध (0 के करीब): दोनों निवेशों के रिटर्न के बीच कोई स्पष्ट और स्थिर रैखिक संबंध नहीं होता। एक निवेश बढ़े तो दूसरा बढ़ भी सकता है, घट भी सकता है या लगभग स्थिर रह सकता है।
- नकारात्मक सहसंबंध (-1 के करीब): दोनों निवेशों के रिटर्न आमतौर पर विपरीत दिशाओं में चलते हैं। एक बढ़ता है तो दूसरे में गिरावट की प्रवृत्ति रहती है।
कम सहसंबंध और नकारात्मक सहसंबंध एक ही बात नहीं हैं।
इक्विटी ETF में निवेश करने वालों के लिए यह अंतर समझना बेहद ज़रूरी है।
कम सहसंबंध वाली रणनीति का मतलब यह नहीं कि “शेयर बाज़ार गिरेगा तो यह ज़रूर मुनाफ़ा देगी।” इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि इस रणनीति का रिटर्न हमेशा शेयर बाज़ार की दिशा का अनुसरण नहीं करता।
शेयर बाज़ार और किसी क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग रणनीति का ऐतिहासिक सहसंबंध शून्य के करीब होने पर भी दोनों में एक साथ नुकसान हो सकता है। इसी तरह, पहले नकारात्मक सहसंबंध रहा हो तो भी हर बाज़ार गिरावट में सुरक्षा मिलने की गारंटी नहीं होती।
असली संभावित फायदा उन रिटर्न स्रोतों को साथ रखने में है जो हमेशा एक जैसे नहीं चलते। यह उम्मीद करना सही नहीं होगा कि एक निवेश दूसरे के हर नुकसान की भरपाई कर देगा।
कम सहसंबंध पोर्टफोलियो की वोलैटिलिटी कैसे घटा सकता है?
मान लीजिए आपके पास निवेश के दो विकल्प हैं:
- इक्विटी ETF: वार्षिकीकृत वोलैटिलिटी 20%।
- वैकल्पिक रणनीति: वार्षिकीकृत वोलैटिलिटी 15% और ETF के साथ सहसंबंध 0।
अगर पूरा पोर्टफोलियो इक्विटी ETF में निवेशित हो, तो इस उदाहरण में उसकी वार्षिकीकृत वोलैटिलिटी 20% होगी।
लेकिन इन्हीं मान्यताओं के आधार पर 80% ETF और 20% वैकल्पिक रणनीति का आवंटन करने पर पोर्टफोलियो की वोलैटिलिटी घटकर लगभग 16.3% हो सकती है। वहीं 60% ETF और 40% वैकल्पिक रणनीति के आवंटन पर यह लगभग 13.4% रह सकती है।
सवाल यह है कि जब दूसरा निवेश भी उतार-चढ़ाव वाला है, तो उसे जोड़ने से कुल उतार-चढ़ाव कम कैसे हो सकता है?
क्योंकि पोर्टफोलियो का जोखिम सिर्फ़ अलग-अलग निवेशों की वोलैटिलिटी पर निर्भर नहीं करता। यह भी मायने रखता है कि उनके रिटर्न एक-दूसरे के मुकाबले कैसे बदलते हैं।
जब दो निवेश हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते, तो कुछ उतार-चढ़ाव एक-दूसरे के असर को आंशिक रूप से कम कर सकते हैं। इससे पूरे पोर्टफोलियो की वैल्यू में होने वाला उतार-चढ़ाव घट सकता है।
यही कम सहसंबंध वाली रणनीतियों का संभावित विविधीकरण लाभ है।
हालाँकि, चार्ट में दिए गए आँकड़े कुछ निश्चित मान्यताओं पर आधारित गणितीय उदाहरण हैं, किसी वास्तविक ट्रेडिंग रणनीति के नतीजे नहीं। कम वोलैटिलिटी का मतलब यह नहीं कि अधिकतम ड्रॉडाउन भी ज़रूर कम होगा या रिटर्न बढ़ेगा।
असल मूल्यांकन यह है कि नई रणनीति जोड़ने के बाद रिटर्न, शुल्क, ट्रेडिंग लागत और जोखिम को ध्यान में रखते हुए आपका कुल पोर्टफोलियो पहले से बेहतर होता है या नहीं।
मकसद हमेशा सबसे अधिक रिटर्न देने वाला निवेश खोजना नहीं, बल्कि ऐसे रिटर्न स्रोतों को मिलाना है जो पोर्टफोलियो में एक-दूसरे की उपयोगिता बढ़ा सकें।
3. लंबी अवधि का रिटर्न ज़रूरी है, बड़े नुकसान को संभालना भी
वार्षिकीकृत रिटर्न निवेश के प्रदर्शन का अहम पैमाना है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। एक और सवाल उतना ही महत्वपूर्ण है: बड़ा नुकसान होने के बाद शुरुआती वैल्यू तक लौटने के लिए पोर्टफोलियो को कितना बढ़ना होगा?मान लीजिए किसी पोर्टफोलियो की वैल्यू 1 करोड़ से घटकर 80 लाख रह जाती है। यह 20% की गिरावट है। लेकिन 80 लाख से वापस 1 करोड़ तक पहुँचने के लिए 20% नहीं, बल्कि 25% की बढ़त चाहिए।
नुकसान जितना बड़ा, उसकी भरपाई उतनी मुश्किल
10% के नुकसान की भरपाई के लिए लगभग 11.1% बढ़त चाहिए। 30% की गिरावट के बाद पहले स्तर पर लौटने के लिए करीब 42.9% रिटर्न ज़रूरी है। अगर पोर्टफोलियो अपनी आधी वैल्यू खो दे, यानी 50% गिर जाए, तो उसे पुराने उच्चतम स्तर तक पहुँचने के लिए 100% बढ़ना होगा—यानी दोगुना होना होगा।
ड्रॉडाउन जितना गहरा होगा, नुकसान की भरपाई के लिए उतना ही अधिक रिटर्न चाहिए।
इस नज़रिए से पहले भाग में दिखाए गए ETF के ऐतिहासिक ड्रॉडाउन और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। लंबी अवधि में अच्छी संभावनाओं वाला निवेश भी ऐसी गिरावट झेल सकता है जिससे उबरने में कई साल लग जाएँ।
जिन निवेशकों को पोर्टफोलियो से नियमित पैसा निकालना है या तय समय पर वित्तीय ज़िम्मेदारियाँ पूरी करनी हैं, उनके लिए लंबा रिकवरी पीरियड खास तौर पर मुश्किल हो सकता है।
इसलिए लंबी अवधि की निवेश रणनीति केवल अधिक रिटर्न पाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। संभावित नुकसान कितना बड़ा हो सकता है और उसका क्या असर पड़ेगा, यह समझना भी उतना ही ज़रूरी है।
उचित रिटर्न का लक्ष्य रखते हुए बड़े ड्रॉडाउन के जोखिम को संभालना, लंबी अवधि की वित्तीय योजनाओं पर टिके रहने में मदद कर सकता है।
रिटर्न के अलग-अलग स्रोतों पर विचार करने की यह भी एक वजह है। उद्देश्य किसी ऐसी रणनीति की तलाश नहीं है जिसमें कभी नुकसान न हो, बल्कि ऐसे संयोजन की संभावना जाँचना है जो एक ही बाज़ार जोखिम पर निर्भरता कम कर सके।
4. क्वांटिटेटिव रणनीति के वास्तविक प्रदर्शन का आकलन कैसे करें?
सहसंबंध और ड्रॉडाउन की भूमिका समझने के बाद अगला सवाल है: क्या कोई क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग रणनीति आपके पोर्टफोलियो में शामिल करने लायक है?शुरुआत प्रचार में बताए गए वार्षिक रिटर्न से नहीं, बल्कि जाँचे जा सकने वाले लाइव ट्रेडिंग रिकॉर्ड से करें।
Myfxbook जैसे थर्ड-पार्टी ट्रेडिंग परफ़ॉर्मेंस ट्रैकिंग प्लेटफ़ॉर्म की मदद से निवेशक किसी रणनीति का ट्रेडिंग इतिहास और प्रदर्शन से जुड़े आँकड़े देख सकते हैं। इससे वास्तविक बाज़ार परिस्थितियों में उसके रिटर्न और जोखिम का बेहतर अंदाज़ा मिलता है।
लेकिन किसी थर्ड-पार्टी प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेडिंग रिकॉर्ड का सत्यापन, स्वतंत्र वित्तीय ऑडिट के बराबर नहीं है। इससे भविष्य के नतीजों की कोई गारंटी भी नहीं मिलती।
सिर्फ़ मुनाफ़ा नहीं, पूरा लाइव ट्रेडिंग रिकॉर्ड देखें
किसी क्वांटिटेटिव रणनीति का मूल्यांकन करते समय चार बातों पर विशेष ध्यान दें:- लाइव ट्रेडिंग का इतिहास: रणनीति वास्तविक बाज़ार में कितने समय से चल रही है? क्या इसने अलग-अलग बाज़ार परिस्थितियों का सामना किया है?
- रिटर्न और अधिकतम ड्रॉडाउन: दर्ज रिटर्न हासिल करने के दौरान निवेश की वैल्यू में कितनी बड़ी गिरावट आई थी?
- लीवरेज, जोखिम एक्सपोज़र और लागत: क्या रणनीति लीवरेज का इस्तेमाल करती है या बड़ी ओपन पोज़िशन रखती है? मैनेजमेंट फ़ीस और दूसरी ट्रेडिंग लागतें क्या हैं?
- मौजूदा ETF के साथ सहसंबंध: क्या रणनीति के रिटर्न का व्यवहार इतना अलग है कि वह पोर्टफोलियो के जोखिम को बेहतर ढंग से फैलाने में मदद कर सके?
लाइव ट्रेडिंग रिकॉर्ड वास्तविक सौदों का अधिक प्रत्यक्ष प्रमाण देता है, लेकिन पिछला प्रदर्शन भविष्य के नतीजों की गारंटी नहीं है।
यदि प्रकाशित प्रदर्शन में बैकटेस्ट या सिमुलेशन के नतीजे भी शामिल हैं, तो उन्हें वास्तविक लाइव ट्रेडिंग के नतीजों से स्पष्ट रूप से अलग दिखाया जाना चाहिए।
जिन निवेशकों के पास पहले से ETF हैं, उनके लिए नई रणनीति चुनने का मकसद सिर्फ़ सबसे अधिक रिटर्न खोजना नहीं होना चाहिए। ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि रणनीति स्वीकार्य जोखिम के दायरे में रिटर्न का कोई उपयोगी अतिरिक्त स्रोत दे सकती है या नहीं।
5. क्या ETF के अलावा दूसरी निवेश रणनीतियाँ भी ज़रूरी हैं?
हर ETF निवेशक को अपने पोर्टफोलियो में क्वांटिटेटिव रणनीति जोड़ने की ज़रूरत नहीं है।अगर आपके मौजूदा निवेश आपके वित्तीय लक्ष्यों, जोखिम सहने की क्षमता और ज़रूरत पड़ने पर पैसा निकालने की आवश्यकताओं के अनुरूप हैं, तो मौजूदा एसेट एलोकेशन बनाए रखना भी एक समझदारी भरा फैसला हो सकता है।
लेकिन जैसे-जैसे पोर्टफोलियो बड़ा होता है, कुछ सवालों पर विचार करना उपयोगी है:
- बाज़ार पर निर्भरता: मेरी कुल निवेश योग्य संपत्ति का कितना हिस्सा शेयर बाज़ार के प्रदर्शन पर निर्भर है?
- बड़ी गिरावट सहने की क्षमता: क्या पोर्टफोलियो में भारी गिरावट मेरी रिटायरमेंट योजना, निर्धारित निकासी या दूसरे वित्तीय लक्ष्यों को प्रभावित करेगी?
- प्रमाण और जोखिम प्रबंधन: क्या प्रस्तावित रणनीति का सत्यापित किया जा सकने वाला लाइव ट्रेडिंग रिकॉर्ड और भरोसेमंद जोखिम प्रबंधन ढाँचा है?
- पोर्टफोलियो में वास्तविक फायदा: शुल्क और जोखिम को ध्यान में रखने के बाद क्या इस रणनीति को जोड़ने से कुल निवेश आवंटन सचमुच बेहतर होगा?
सिर्फ़ कम सहसंबंध होना किसी रणनीति में निवेश करने की पर्याप्त वजह नहीं है।
नई रणनीति पर तभी विचार करना चाहिए जब उसकी रिटर्न की संभावनाएँ, जोखिम और व्यावहारिक शर्तें निवेशक के वित्तीय लक्ष्यों और सीमाओं के अनुरूप हों।
निष्कर्ष: ETF बनाए रखें, लेकिन विविधीकरण के बारे में व्यापक सोचें
कई निवेशकों के लिए लंबे समय तक ETF में निवेश करना अब भी एक उचित तरीका है। कम सहसंबंध वाली रणनीतियों पर विचार करने का मतलब अपने मौजूदा ETF छोड़ना नहीं है।असली सवाल यह है:
“क्या मेरा पोर्टफोलियो एक जैसे बाज़ार-आधारित रिटर्न स्रोतों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है? क्या कोई अलग रणनीति जोड़कर मैं लंबी अवधि की ग्रोथ का लक्ष्य रखते हुए जोखिम को बेहतर तरीके से संभाल सकता हूँ?”
जिन निवेशकों ने पहले से लंबे समय के लिए ETF में निवेश किया हुआ है, उनके लिए ऐतिहासिक अधिकतम ड्रॉडाउन, रिटर्न के सहसंबंध और अलग-अलग एसेट एलोकेशन के प्रभाव को समझना बेहतर पोर्टफोलियो बनाने की अच्छी शुरुआत है।
कम सहसंबंध वाली रणनीतियों का अध्ययन करते समय तीन प्रमुख बातों से शुरुआत करें:
- सत्यापित किया जा सकने वाला लाइव प्रदर्शन: वास्तविक ट्रेडिंग नतीजों, ट्रैक रिकॉर्ड की अवधि और उससे जुड़ी लागतों की जाँच करें।
- जोखिम और ड्रॉडाउन का इतिहास: देखें कि अलग-अलग बाज़ार परिस्थितियों में रणनीति का प्रदर्शन और जोखिम कैसा रहा है।
- आपके मौजूदा ETF के साथ सहसंबंध: समान समयावधि के रिटर्न डेटा की तुलना करके परखें कि रणनीति जोड़ने से वास्तव में विविधीकरण का फायदा मिल सकता है या नहीं।
हम क्वांटिटेटिव रणनीतियों पर शोध, जोखिम प्रबंधन और एसेट एलोकेशन से जुड़े विचारों के आदान-प्रदान का स्वागत करते हैं, ताकि इच्छुक निवेशक अपने विकल्पों का अधिक ठोस आधार पर मूल्यांकन कर सकें।
एक अच्छा पोर्टफोलियो सिर्फ़ रिटर्न कमाने के लिए नहीं बनाया जाता। उसका उद्देश्य लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों तक पहुँचने के रास्ते में आने वाले जोखिमों को संभालना भी है।