ब्रॉड मार्केट ETF के अलावा भी निवेश क्यों ज़रूरी हो सकता है?
"मैं पहले से ही एक ऐसे ETF में निवेश करता हूँ जिसमें सैकड़ों कंपनियों के शेयर हैं। फिर मुझे दूसरे निवेशों की ज़रूरत क्यों होगी?"
यह सवाल बिल्कुल वाजिब है।
लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के लिए ब्रॉड मार्केट ETF कई निवेशकों के लिए एक बेहतरीन शुरुआती विकल्प हो सकते हैं।
हर शेयर को अलग-अलग चुनने में घंटों लगाने के बजाय, आप एक ही ETF के ज़रिए कई कंपनियों और व्यापक शेयर बाज़ार की ग्रोथ में हिस्सा ले सकते हैं। साथ ही, किसी एक कंपनी के खराब प्रदर्शन का आपके निवेश पर पड़ने वाला असर भी कम होता है।
लेकिन यहाँ एक अहम बात है जिसे कई निवेशक नज़रअंदाज़ कर देते हैं:
ETF अलग-अलग कंपनियों से जुड़े जोखिम को कम कर सकता है। लेकिन जब पूरा शेयर बाज़ार गिरता है, तब आपके पोर्टफोलियो को क्या बचाता है?
इस सवाल का जवाब समझने के लिए एसेट एलोकेशन में सहसंबंध (Correlation) की भूमिका जानना ज़रूरी है।
असली डाइवर्सिफिकेशन सिर्फ ज़्यादा निवेश रखने के बारे में नहीं है। यह ऐसे निवेशों को साथ रखने के बारे में है जिनके रिटर्न अलग-अलग कारणों से प्रभावित होते हैं।
इस लेख में हम ETF, बॉन्ड और वैकल्पिक निवेश रणनीतियों के बीच संबंध समझेंगे। जानेंगे कि पॉज़िटिव, नेगेटिव और ज़ीरो कोरिलेशन क्या होता है और शेयर बाज़ार से कम सहसंबंध वाली रणनीतियाँ आपके पोर्टफोलियो के जोखिम और रिटर्न के संतुलन को कैसे बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं।
आपका पैसा सिर्फ एक कंपनी के शेयर में लगाने के बजाय अमेरिका की कई बड़ी लिस्टेड कंपनियों में बँट जाता है।
इसका फायदा स्पष्ट है।
अगर किसी कंपनी के वित्तीय नतीजे उम्मीद से खराब आते हैं, मैनेजमेंट गलत फैसले लेता है या उसके शेयर की कीमत तेज़ी से गिरती है, तो दूसरी कंपनियों का बेहतर प्रदर्शन उस नुकसान की कुछ भरपाई कर सकता है।
लेकिन अगर समस्या किसी एक कंपनी तक सीमित न हो तो?
अगर पूरा शेयर बाज़ार ही गिरने लगे तो?
आर्थिक मंदी, वित्तीय संकट, महँगाई में अचानक तेज़ बढ़ोतरी या बड़े पैमाने पर बिकवाली के कारण सैकड़ों शेयर एक साथ गिर सकते हैं।
ऐसी स्थिति में सैकड़ों कंपनियों में निवेश करने वाला ETF भी बड़ा नुकसान उठा सकता है।
इसकी वजह है:
ETF कंपनी-विशेष जोखिम को कम करने में मदद करता है, लेकिन पूरे बाज़ार से जुड़े सिस्टमैटिक रिस्क (Systematic Risk) को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता।
आपके पास अलग-अलग कंपनियों के शेयर हो सकते हैं, लेकिन सभी कंपनियाँ समान आर्थिक परिस्थितियों और बाज़ार से जुड़े जोखिमों से प्रभावित होती हैं।
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए।
मान लीजिए आपने अपने अंडे सैकड़ों अलग-अलग टोकरियों में रख दिए।
अब एक टोकरी टूटने से पूरा नुकसान नहीं होगा। लेकिन अगर सारी टोकरियाँ एक ही ट्रक में रखी हों और वह ट्रक पलट जाए, तो सभी टोकरियाँ खतरे में पड़ जाएँगी।
परिदृश्य A दिखाता है कि कई कंपनियों में निवेश करने से किसी एक कंपनी से जुड़ा जोखिम कैसे कम होता है। वहीं परिदृश्य B बताता है कि पूरे बाज़ार में गिरावट के दौरान ब्रॉड मार्केट ETF भी सिस्टमैटिक रिस्क से प्रभावित हो सकता है।
इसलिए बेहतर डाइवर्सिफिकेशन का अगला कदम हमेशा और शेयर खरीदना नहीं होता।
इसके बजाय खुद से पूछिए:
क्या मेरे पोर्टफोलियो में रिटर्न के ऐसे स्रोत भी हैं जो शेयर बाज़ार पर निर्भर नहीं हैं?
वित्तीय विश्लेषण में कोरिलेशन कोएफिशिएंट (Correlation Coefficient) का इस्तेमाल दो एसेट के रिटर्न के बीच रैखिक संबंध की दिशा और मज़बूती मापने के लिए किया जाता है।
इसका मान -1 से +1 के बीच होता है।
इन मानों को समझकर आप पता लगा सकते हैं कि कोई नया निवेश वास्तव में आपके पोर्टफोलियो में विविधता ला रहा है या सिर्फ पहले से मौजूद जोखिम को बढ़ा रहा है।
मान लीजिए आपके पास दो ऐसे ETF हैं जो अमेरिका की बड़ी कंपनियों के शेयर बाज़ार को ट्रैक करते हैं।
उनके नाम, फंड हाउस और टिकर अलग हो सकते हैं। लेकिन अगर दोनों में लगभग एक जैसे शेयर हैं, तो उनकी परफॉर्मेंस भी काफ़ी मिलती-जुलती हो सकती है।
ऐसे में दूसरा ETF जोड़ने से आपके फंड की संख्या तो बढ़ जाएगी, लेकिन डाइवर्सिफिकेशन ज़रूरी नहीं कि बेहतर हो।
एक निवेश में नुकसान होने पर दूसरा बढ़ सकता है और उस नुकसान के कुछ हिस्से की भरपाई कर सकता है।
ऐतिहासिक रूप से कुछ बाज़ार स्थितियों में शेयरों और सरकारी बॉन्ड के बीच नेगेटिव कोरिलेशन देखा गया है।
लेकिन एक बात याद रखना ज़रूरी है:
शेयर और बॉन्ड के बीच हमेशा नेगेटिव कोरिलेशन नहीं होता।
जब महँगाई और ब्याज दरें तेज़ी से बढ़ती हैं, तो शेयरों और बॉन्ड की कीमतें एक साथ गिर सकती हैं।
इसलिए बॉन्ड शेयर बाज़ार के नुकसान को कितना कम कर पाएँगे, यह आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
उदाहरण के लिए:
इसका मतलब यह नहीं कि ज़ीरो कोरिलेशन वाली रणनीति में जोखिम नहीं होता।
उसमें भी नुकसान हो सकता है। साथ ही, शेयर बाज़ार गिरते समय उस रणनीति से मुनाफ़ा होने की कोई गारंटी नहीं है।
संभावित फायदा कुछ और है:
रणनीति का रिटर्न हमेशा शेयर बाज़ार की दिशा पर निर्भर नहीं होता।
यह भी ध्यान रखें कि 0 के करीब कोरिलेशन (r ≈ 0) होने का मतलब दो निवेशों का पूरी तरह स्वतंत्र होना नहीं है। उनके बीच गैर-रैखिक संबंध हो सकते हैं और बाज़ार में असाधारण उथल-पुथल के दौरान दोनों में एक साथ नुकसान भी हो सकता है।
पॉज़िटिव कोरिलेशन (r > 0) में रिटर्न एक ही दिशा में चलने की प्रवृत्ति दिखाते हैं। नेगेटिव कोरिलेशन (r < 0) में वे विपरीत दिशाओं में चलते हैं। वहीं ज़ीरो के करीब कोरिलेशन (r ≈ 0) स्पष्ट रैखिक संबंध न होने का संकेत देता है।
जिन निवेशकों के पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा पहले से ब्रॉड मार्केट ETF में लगा है, उनके लिए अलग रिटर्न पैटर्न वाले निवेश अतिरिक्त डाइवर्सिफिकेशन का विकल्प हो सकते हैं।
आखिर डाइवर्सिफिकेशन का लक्ष्य ऐसे निवेश ढूँढ़ना नहीं है जो हमेशा ऊपर ही जाएँ।
लक्ष्य ऐसा पोर्टफोलियो बनाना है जिसमें सभी निवेश एक जैसे मार्केट फ़ैक्टर पर निर्भर न हों।
शेयर और बॉन्ड का संयोजन लंबे समय से निवेश पोर्टफोलियो बनाने का एक पारंपरिक तरीका रहा है।
शेयर लंबी अवधि में पूँजी बढ़ाने की संभावना देते हैं, जबकि अच्छी क्रेडिट क्वालिटी वाले बॉन्ड ब्याज से आय दे सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में पोर्टफोलियो की अस्थिरता कम करने में मदद कर सकते हैं।
लेकिन शेयर और बॉन्ड हमेशा एक-दूसरे के जोखिम की भरपाई नहीं करते।
महँगाई में अचानक बढ़ोतरी, ब्याज दरों में तेज़ बदलाव या बाज़ार में लिक्विडिटी की कमी होने पर दोनों एसेट क्लास एक साथ दबाव में आ सकते हैं।
इसका मतलब है कि शेयर और बॉन्ड का मिश्रण भी साझा आर्थिक जोखिमों को पूरी तरह खत्म नहीं करता।
इसीलिए कुछ निवेशक पारंपरिक एसेट क्लास के बाहर रिटर्न के अतिरिक्त स्रोत तलाशते हैं।
ऐसे कुछ विकल्प हैं:
ये रणनीतियाँ ETF या बॉन्ड से अपने-आप ज़्यादा सुरक्षित या लाभदायक नहीं हो जातीं।
हर वैकल्पिक निवेश का शेयर बाज़ार से कोरिलेशन कम हो, यह भी ज़रूरी नहीं है।
फिर भी कुछ रणनीतियाँ अध्ययन के योग्य हो सकती हैं, क्योंकि वे अलग ट्रेडिंग तरीकों, मार्केट अवसरों और जोखिम स्रोतों के आधार पर रिटर्न हासिल करने का प्रयास करती हैं।
सही एसेट एलोकेशन का मतलब ऐसा निवेश खोजना नहीं है जिसमें कभी नुकसान न हो। इसका मतलब ऐसा पोर्टफोलियो बनाना है जिसकी सफलता सिर्फ एक तरह की मार्केट परिस्थिति पर निर्भर न हो।
पोर्टफोलियो का कुल जोखिम सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि हर निवेश में कितना उतार-चढ़ाव है।
यह भी मायने रखता है कि अलग-अलग निवेशों के रिटर्न एक-दूसरे से किस तरह संबंधित हैं।
मान लीजिए एक पोर्टफोलियो में दो एसेट हैं।
एसेट A एक ब्रॉड मार्केट ETF है। एसेट B शेयर बाज़ार से कम सहसंबंध वाली निवेश रणनीति है।
अगर एसेट B का अपेक्षित रिटर्न, जोखिम और लागत उचित हो, तो दोनों को सही अनुपात में मिलाने से पूरे पोर्टफोलियो की अस्थिरता कम हो सकती है।
क्यों?
क्योंकि दोनों निवेश एक ही समय पर बढ़ते या गिरते हों, यह ज़रूरी नहीं।
जब एक निवेश खराब प्रदर्शन करता है, तब दूसरा अपेक्षाकृत स्थिर रह सकता है या अलग रिटर्न पैटर्न दिखा सकता है।
इसी अंतर से डाइवर्सिफिकेशन का संभावित फायदा मिलता है।
यह भी मान लेते हैं कि एक ही अवधि में दोनों के रिटर्न के बीच कोरिलेशन शून्य है (ρ = 0)।
अगर पोर्टफोलियो का 50% एसेट A और 50% एसेट B में लगाया जाए, तो पूरे पोर्टफोलियो की सैद्धांतिक सालाना वोलैटिलिटी घटकर लगभग 14.1% हो जाती है, जबकि दोनों में से किसी एक एसेट को अकेले रखने पर यह 20% है।
यह चार्ट डाइवर्सिफिकेशन का एक काल्पनिक उदाहरण दिखाता है: भले ही एसेट A और B दोनों अंत में पॉज़िटिव रिटर्न दें, लेकिन बीच की अवधि में उनकी कीमतों में काफ़ी उतार-चढ़ाव हो सकता है। कम कोरिलेशन वाले निवेशों को मिलाने से समान अपेक्षित रिटर्न के साथ पोर्टफोलियो के मूल्य में अपेक्षाकृत कम उतार-चढ़ाव संभव हो सकता है।
इसे डाइवर्सिफिकेशन बेनिफिट (Diversification Benefit) कहा जाता है।
चार्ट में दिखाई गई ग्रोथ कर्व केवल समझाने के लिए हैं। ये किसी वास्तविक निवेश रणनीति की परफॉर्मेंस नहीं दिखातीं। वास्तविक परिणाम रिटर्न, बदलते कोरिलेशन, एसेट एलोकेशन, ट्रांज़ैक्शन कॉस्ट और अन्य जोखिमों पर निर्भर करते हैं। कम कोरिलेशन से मुनाफ़े की गारंटी नहीं मिलती।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दो एसेट में निवेश करते ही आपका रिटर्न दोगुना हो जाएगा।
संभावित फायदा अधिक व्यावहारिक है:
पोर्टफोलियो की कुल अस्थिरता कम रखते हुए लगभग समान अपेक्षित रिटर्न पाने की कोशिश करना।
इससे रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न (Risk-Adjusted Return) बेहतर हो सकता है। यह माप बताता है कि लिए गए जोखिम की तुलना में निवेश ने कितना रिटर्न दिया।
लंबी अवधि के निवेशकों के लिए सिर्फ कुल रिटर्न ही महत्वपूर्ण नहीं होता।
वोलैटिलिटी और मैक्सिमम ड्रॉडाउन (Maximum Drawdown) भी उतने ही महत्वपूर्ण संकेतक हैं।
कोई रणनीति लंबे समय में आकर्षक दिख सकती है, लेकिन तेज़ बाज़ार गिरावट के दौरान उसमें निवेश बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
अपने जोखिम सहने की क्षमता के अनुरूप पोर्टफोलियो बनाना लंबी अवधि की निवेश योजना पर टिके रहने में मदद कर सकता है।
आप लंबी अवधि के शेयर निवेश की संभावनाओं पर भरोसा करते हैं और बाज़ार के सामान्य उतार-चढ़ाव को स्वीकार करते हैं।
ऐसी स्थिति में कम कोरिलेशन वाली रणनीति जोड़ने का उद्देश्य ज़रूरी नहीं कि सबसे ज़्यादा रिटर्न कमाना हो।
इसका उद्देश्य शेयर बाज़ार की परफॉर्मेंस पर पूरे पोर्टफोलियो की निर्भरता कम करना भी हो सकता है।
आइए 3 संभावित पोर्टफोलियो की तुलना करें।
इससे आप उस शेयर बाज़ार की परफॉर्मेंस में सीधे हिस्सा लेते हैं जिसे आपका ETF ट्रैक करता है।
लेकिन पोर्टफोलियो का अधिकांश जोखिम शेयर बाज़ार से जुड़ा रहता है। बड़ी मार्केट करेक्शन के दौरान पोर्टफोलियो में भारी गिरावट आ सकती है।
अच्छी क्रेडिट क्वालिटी वाले बॉन्ड ब्याज से आय दे सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में पोर्टफोलियो की अस्थिरता कम करने में मदद कर सकते हैं।
लेकिन ब्याज दर का जोखिम, क्रेडिट रिस्क और शेयरों व बॉन्ड के एक साथ गिरने की संभावना बनी रहती है।
यदि रणनीति कम कोरिलेशन बनाए रखती है और उसका जोखिम-रिटर्न प्रोफ़ाइल उचित है, तो यह पोर्टफोलियो के डाइवर्सिफिकेशन को बेहतर बना सकती है।
हालाँकि क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग के अपने जोखिम हैं, जिनमें पूँजी का नुकसान, मॉडल की विफलता, लिक्विडिटी की समस्या, लेवरेज और ट्रेड एग्ज़िक्यूशन से जुड़े जोखिम शामिल हैं।
अतीत में कम कोरिलेशन होने से यह गारंटी नहीं मिलती कि गंभीर बाज़ार संकट के दौरान रणनीति आपके पोर्टफोलियो को नुकसान से बचा पाएगी।
इन 3 विकल्पों में से कोई भी हर निवेशक के लिए सबसे अच्छा नहीं है।
ये विकल्प एक-दूसरे के विरोधी भी नहीं हैं। आप शेयर, बॉन्ड और क्वांटिटेटिव रणनीतियों को एक ही पोर्टफोलियो में रखने की संभावना भी देख सकते हैं।
इस काल्पनिक तुलना में पोर्टफोलियो A (100% ब्रॉड मार्केट ETF) का मैक्सिमम ड्रॉडाउन −32%, पोर्टफोलियो B (ETF + बॉन्ड) का −24% और पोर्टफोलियो C (ETF + कम कोरिलेशन वाली रणनीतियाँ) का −18% दिखाया गया है।
यह उदाहरण बताता है कि रिटर्न के अलग-अलग स्रोत बाज़ार गिरने पर पोर्टफोलियो का नुकसान कम करने में कैसे मदद कर सकते हैं। लेकिन ये आँकड़े केवल काल्पनिक हैं, किसी वास्तविक निवेश रणनीति के प्रदर्शन के परिणाम नहीं। वास्तविक फायदे का मूल्यांकन ऐतिहासिक डेटा के आधार पर किया जाना चाहिए।
आपके लिए सही एसेट एलोकेशन आपके निवेश लक्ष्यों, जोखिम सहने की क्षमता, निवेश की समय-सीमा और पोर्टफोलियो में हर एसेट की भूमिका पर निर्भर करता है।
शायद एक अलग सवाल ज़्यादा उपयोगी हो:
"क्या मेरे पोर्टफोलियो को ऐसे रिटर्न स्रोत से फायदा हो सकता है जिसे मुनाफ़ा कमाने के लिए शेयर बाज़ार का बढ़ना ज़रूरी न हो?"
यही निवेश दृष्टिकोण Mr.Forex अपनी क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग रणनीतियों के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहता है।
इन्हें परखने के लिए एक महत्वपूर्ण मापदंड है—रणनीति के रिटर्न और व्यापक शेयर बाज़ार के रिटर्न के बीच ऐतिहासिक कोरिलेशन।
अगर दोनों के रिटर्न की तुलना समान समयावधि और समान डेटा फ़्रीक्वेंसी पर की जाए, तो 0 के करीब कोरिलेशन यह संकेत देता है कि उस अवधि में रणनीति और शेयर बाज़ार के रिटर्न के बीच स्पष्ट रैखिक संबंध नहीं था।
इसलिए ऐसी रणनीतियाँ पारंपरिक शेयर ETF से अलग डाइवर्सिफिकेशन विशेषताएँ प्रदान कर सकती हैं।
लेकिन कोरिलेशन स्थिर नहीं रहता।
बाज़ार की परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। किसी रणनीति का अतीत में कम कोरिलेशन होने का मतलब यह नहीं कि भविष्य में भी वह वैसी ही रहेगी।
ETF लंबी अवधि के पोर्टफोलियो का मुख्य आधार बने रह सकते हैं।
क्वांटिटेटिव रणनीतियों को रिटर्न के संभावित अतिरिक्त स्रोत के रूप में परखा जा सकता है।
महत्वपूर्ण सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोई ट्रेडिंग रणनीति अकेले कितनी कमाई करती है।
असल सवाल यह है कि उसे मौजूदा ETF पोर्टफोलियो में जोड़ने से पूरे पोर्टफोलियो का जोखिम-रिटर्न संतुलन बेहतर होता है या नहीं।
इसका आकलन करने के लिए कुछ सवाल पूछिए:
एसेट एलोकेशन में क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग की उपयोगिता समझने के लिए यही सवाल अधिक महत्वपूर्ण हैं।
इन 4 बातों पर ध्यान दें:
यह तय करने से पहले कि कम कोरिलेशन वाली रणनीति आपके पोर्टफोलियो में उचित होगी या नहीं, Mr.Forex पर उपलब्ध ऐतिहासिक परफॉर्मेंस और जोखिम के आँकड़े देखें।
उद्देश्य सिर्फ अधिक रिटर्न देने वाली रणनीति ढूँढ़ना नहीं, बल्कि यह समझना है कि वह आपके मौजूदा निवेशों के साथ मिलकर कैसा प्रदर्शन कर सकती है।
लेकिन वह पूरे शेयर बाज़ार की गतिविधियों से प्रभावित होता रहता है।
अधिक डाइवर्सिफिकेशन चाहने वाले निवेशक बॉन्ड या कम कोरिलेशन वाले अन्य निवेशों का मूल्यांकन कर सकते हैं और देख सकते हैं कि इससे पोर्टफोलियो का कुल जोखिम कितना बदलता है।
यह दर्शाता है कि उनके ऐतिहासिक रिटर्न के बीच कोई स्पष्ट रैखिक संबंध नहीं है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों निवेश पूरी तरह स्वतंत्र हैं या उनमें नुकसान नहीं हो सकता।
नेगेटिव कोरिलेशन वाले निवेश कुछ मार्केट नुकसान की अधिक सीधे भरपाई कर सकते हैं, लेकिन उनका आपसी संबंध बदल सकता है।
वहीं 0 के करीब कोरिलेशन वाले निवेश अलग रिटर्न स्रोत उपलब्ध करा सकते हैं।
दोनों का मूल्यांकन अपेक्षित रिटर्न, वोलैटिलिटी, लागत और असाधारण बाज़ार परिस्थितियों के जोखिम के आधार पर होना चाहिए।
क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग में पूर्वनिर्धारित नियमों, सांख्यिकीय मॉडलों या एल्गोरिदम के आधार पर ट्रेडिंग निर्णय लिए जाते हैं।
रणनीति की बनावट के अनुसार उसका शेयर बाज़ार के साथ पॉज़िटिव, नेगेटिव या कम कोरिलेशन हो सकता है।
वास्तविक कोरिलेशन का पता ऐतिहासिक रिटर्न डेटा से लगाना चाहिए।
इसका प्रभाव रणनीति की अपनी वोलैटिलिटी, मौजूदा निवेशों के साथ उसके कोरिलेशन, पोर्टफोलियो में उसके एलोकेशन और मार्केट परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
बहुत अधिक उतार-चढ़ाव वाली रणनीति, शेयर बाज़ार से कम कोरिलेशन होने के बावजूद, पूरे पोर्टफोलियो का जोखिम बढ़ा सकती है।
सामान्य बाज़ार परिस्थितियों में कम वोलैटिलिटी होने से भी असाधारण संकट के दौरान बड़े नुकसान से सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती।
क्वांटिटेटिव कॉपी ट्रेडिंग में किसी दूसरी ट्रेडिंग रणनीति के सौदों की नकल की जाती है। इससे अलग रिटर्न स्रोतों तक पहुँच मिल सकती है, लेकिन पूँजी का नुकसान, ट्रेड निष्पादन में अंतर और रणनीति विफल होने जैसे जोखिम भी होते हैं।
निवेश करने से पहले रणनीति की कार्यप्रणाली, ट्रेडिंग शर्तों और संबंधित जोखिमों को अच्छी तरह समझना ज़रूरी है।
मुख्य सवाल यह नहीं है कि आपके पास पहले से ETF हैं या नहीं।
असल सवाल है कि क्या अतिरिक्त रणनीति आपके पूरे पोर्टफोलियो में वास्तविक डाइवर्सिफिकेशन का लाभ दे सकती है।
लेकिन सैकड़ों कंपनियों के शेयर रखना और कई अलग रिटर्न स्रोतों वाला पोर्टफोलियो बनाना एक ही बात नहीं है।
पहला तरीका शेयर बाज़ार के भीतर जोखिम फैलाता है।
दूसरा तरीका पूरे पोर्टफोलियो की साझा मार्केट रिस्क पर निर्भरता कम करने की कोशिश करता है।
शेयर, बॉन्ड और कम कोरिलेशन वाली क्वांटिटेटिव रणनीतियाँ, तीनों की भूमिका अलग हो सकती है।
ज़रूरी नहीं कि एक निवेश को दूसरे की जगह लेना पड़े।
मुख्य बात यह समझना है कि क्या सही संयोजन से जोखिम और अपेक्षित रिटर्न के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।
समझदारी से एसेट एलोकेशन करने का मतलब सिर्फ सबसे ज़्यादा रिटर्न वाला निवेश खोजना नहीं है। इसका मतलब ऐसे निवेशों का संयोजन बनाना है जो आपकी जोखिम सहने की क्षमता के अनुरूप हो और लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करे।
अगर ब्रॉड मार्केट ETF पहले से आपके पोर्टफोलियो की नींव हैं, तो ऐसी रणनीतियों का अध्ययन करना उपयोगी हो सकता है जिनका प्रदर्शन पूरी तरह शेयर बाज़ार की दिशा पर निर्भर नहीं होता।
मूल्यांकन करें कि रिटर्न का एक अलग स्रोत आपके मौजूदा ETF निवेशों का उपयोगी पूरक बन सकता है या नहीं।
जोखिम संबंधी चेतावनी: यह लेख केवल वित्तीय शिक्षा और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे व्यक्तिगत निवेश सलाह या किसी निश्चित रिटर्न अथवा मुनाफ़े की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए। सभी काल्पनिक और सिमुलेटेड आँकड़े केवल निवेश संबंधी अवधारणाएँ समझाने के लिए दिए गए हैं; ये किसी भी ट्रेडिंग रणनीति की वास्तविक परफॉर्मेंस नहीं दर्शाते। पिछली परफॉर्मेंस और कोरिलेशन कोएफिशिएंट भविष्य के परिणामों की गारंटी नहीं देते। क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग और कॉपी ट्रेडिंग में निवेश की गई पूँजी का कुछ हिस्सा या पूरा हिस्सा खोने का जोखिम रहता है। निवेश करने से पहले संबंधित रणनीति, ट्रेडिंग शर्तों, लागू शुल्क और संभावित जोखिमों की सावधानीपूर्वक जाँच करें।
यह सवाल बिल्कुल वाजिब है।
लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के लिए ब्रॉड मार्केट ETF कई निवेशकों के लिए एक बेहतरीन शुरुआती विकल्प हो सकते हैं।
हर शेयर को अलग-अलग चुनने में घंटों लगाने के बजाय, आप एक ही ETF के ज़रिए कई कंपनियों और व्यापक शेयर बाज़ार की ग्रोथ में हिस्सा ले सकते हैं। साथ ही, किसी एक कंपनी के खराब प्रदर्शन का आपके निवेश पर पड़ने वाला असर भी कम होता है।
लेकिन यहाँ एक अहम बात है जिसे कई निवेशक नज़रअंदाज़ कर देते हैं:
ETF अलग-अलग कंपनियों से जुड़े जोखिम को कम कर सकता है। लेकिन जब पूरा शेयर बाज़ार गिरता है, तब आपके पोर्टफोलियो को क्या बचाता है?
इस सवाल का जवाब समझने के लिए एसेट एलोकेशन में सहसंबंध (Correlation) की भूमिका जानना ज़रूरी है।
असली डाइवर्सिफिकेशन सिर्फ ज़्यादा निवेश रखने के बारे में नहीं है। यह ऐसे निवेशों को साथ रखने के बारे में है जिनके रिटर्न अलग-अलग कारणों से प्रभावित होते हैं।
इस लेख में हम ETF, बॉन्ड और वैकल्पिक निवेश रणनीतियों के बीच संबंध समझेंगे। जानेंगे कि पॉज़िटिव, नेगेटिव और ज़ीरो कोरिलेशन क्या होता है और शेयर बाज़ार से कम सहसंबंध वाली रणनीतियाँ आपके पोर्टफोलियो के जोखिम और रिटर्न के संतुलन को कैसे बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं।
1. सैकड़ों शेयर होने पर भी मार्केट रिस्क खत्म क्यों नहीं होता?
मान लीजिए आप S&P 500 इंडेक्स को ट्रैक करने वाले ETF में निवेश करते हैं।आपका पैसा सिर्फ एक कंपनी के शेयर में लगाने के बजाय अमेरिका की कई बड़ी लिस्टेड कंपनियों में बँट जाता है।
इसका फायदा स्पष्ट है।
अगर किसी कंपनी के वित्तीय नतीजे उम्मीद से खराब आते हैं, मैनेजमेंट गलत फैसले लेता है या उसके शेयर की कीमत तेज़ी से गिरती है, तो दूसरी कंपनियों का बेहतर प्रदर्शन उस नुकसान की कुछ भरपाई कर सकता है।
लेकिन अगर समस्या किसी एक कंपनी तक सीमित न हो तो?
अगर पूरा शेयर बाज़ार ही गिरने लगे तो?
आर्थिक मंदी, वित्तीय संकट, महँगाई में अचानक तेज़ बढ़ोतरी या बड़े पैमाने पर बिकवाली के कारण सैकड़ों शेयर एक साथ गिर सकते हैं।
ऐसी स्थिति में सैकड़ों कंपनियों में निवेश करने वाला ETF भी बड़ा नुकसान उठा सकता है।
इसकी वजह है:
ETF कंपनी-विशेष जोखिम को कम करने में मदद करता है, लेकिन पूरे बाज़ार से जुड़े सिस्टमैटिक रिस्क (Systematic Risk) को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता।
आपके पास अलग-अलग कंपनियों के शेयर हो सकते हैं, लेकिन सभी कंपनियाँ समान आर्थिक परिस्थितियों और बाज़ार से जुड़े जोखिमों से प्रभावित होती हैं।
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए।
मान लीजिए आपने अपने अंडे सैकड़ों अलग-अलग टोकरियों में रख दिए।
अब एक टोकरी टूटने से पूरा नुकसान नहीं होगा। लेकिन अगर सारी टोकरियाँ एक ही ट्रक में रखी हों और वह ट्रक पलट जाए, तो सभी टोकरियाँ खतरे में पड़ जाएँगी।
परिदृश्य A दिखाता है कि कई कंपनियों में निवेश करने से किसी एक कंपनी से जुड़ा जोखिम कैसे कम होता है। वहीं परिदृश्य B बताता है कि पूरे बाज़ार में गिरावट के दौरान ब्रॉड मार्केट ETF भी सिस्टमैटिक रिस्क से प्रभावित हो सकता है।
इसलिए बेहतर डाइवर्सिफिकेशन का अगला कदम हमेशा और शेयर खरीदना नहीं होता।
इसके बजाय खुद से पूछिए:
क्या मेरे पोर्टफोलियो में रिटर्न के ऐसे स्रोत भी हैं जो शेयर बाज़ार पर निर्भर नहीं हैं?
2. एसेट कोरिलेशन: बेहतर पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन की असली कुंजी
सहसंबंध यानी Correlation बताता है कि दो निवेशों के रिटर्न एक-दूसरे के साथ किस हद तक बदलते हैं।वित्तीय विश्लेषण में कोरिलेशन कोएफिशिएंट (Correlation Coefficient) का इस्तेमाल दो एसेट के रिटर्न के बीच रैखिक संबंध की दिशा और मज़बूती मापने के लिए किया जाता है।
इसका मान -1 से +1 के बीच होता है।
इन मानों को समझकर आप पता लगा सकते हैं कि कोई नया निवेश वास्तव में आपके पोर्टफोलियो में विविधता ला रहा है या सिर्फ पहले से मौजूद जोखिम को बढ़ा रहा है।
पॉज़िटिव कोरिलेशन: जब निवेश एक ही दिशा में चलते हैं
जब कोरिलेशन +1 के करीब होता है, तो इसका मतलब है कि दो निवेशों के रिटर्न आमतौर पर एक ही दिशा में चलते हैं।मान लीजिए आपके पास दो ऐसे ETF हैं जो अमेरिका की बड़ी कंपनियों के शेयर बाज़ार को ट्रैक करते हैं।
उनके नाम, फंड हाउस और टिकर अलग हो सकते हैं। लेकिन अगर दोनों में लगभग एक जैसे शेयर हैं, तो उनकी परफॉर्मेंस भी काफ़ी मिलती-जुलती हो सकती है।
ऐसे में दूसरा ETF जोड़ने से आपके फंड की संख्या तो बढ़ जाएगी, लेकिन डाइवर्सिफिकेशन ज़रूरी नहीं कि बेहतर हो।
नेगेटिव कोरिलेशन: जब एक निवेश बढ़ता है और दूसरा गिरता है
जब कोरिलेशन -1 के करीब होता है, तो दो निवेशों के रिटर्न आमतौर पर विपरीत दिशाओं में चलते हैं।एक निवेश में नुकसान होने पर दूसरा बढ़ सकता है और उस नुकसान के कुछ हिस्से की भरपाई कर सकता है।
ऐतिहासिक रूप से कुछ बाज़ार स्थितियों में शेयरों और सरकारी बॉन्ड के बीच नेगेटिव कोरिलेशन देखा गया है।
लेकिन एक बात याद रखना ज़रूरी है:
शेयर और बॉन्ड के बीच हमेशा नेगेटिव कोरिलेशन नहीं होता।
जब महँगाई और ब्याज दरें तेज़ी से बढ़ती हैं, तो शेयरों और बॉन्ड की कीमतें एक साथ गिर सकती हैं।
इसलिए बॉन्ड शेयर बाज़ार के नुकसान को कितना कम कर पाएँगे, यह आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
ज़ीरो कोरिलेशन: जब निवेशों के रिटर्न एक ही पैटर्न नहीं अपनाते
जब कोरिलेशन 0 के करीब होता है, तो दो एसेट के रिटर्न के बीच कोई स्पष्ट रैखिक संबंध नहीं होता।उदाहरण के लिए:
- शेयर बाज़ार बढ़ रहा हो, तब किसी ट्रेडिंग रणनीति में मुनाफ़ा या नुकसान दोनों हो सकते हैं।
- शेयर बाज़ार गिरने पर उस रणनीति का रिटर्न उसी दिशा में गिरना ज़रूरी नहीं है।
- रणनीति की परफॉर्मेंस दूसरे मार्केट फ़ैक्टर, ट्रेडिंग सिग्नल या अलग जोखिम स्रोतों पर निर्भर हो सकती है।
इसका मतलब यह नहीं कि ज़ीरो कोरिलेशन वाली रणनीति में जोखिम नहीं होता।
उसमें भी नुकसान हो सकता है। साथ ही, शेयर बाज़ार गिरते समय उस रणनीति से मुनाफ़ा होने की कोई गारंटी नहीं है।
संभावित फायदा कुछ और है:
रणनीति का रिटर्न हमेशा शेयर बाज़ार की दिशा पर निर्भर नहीं होता।
यह भी ध्यान रखें कि 0 के करीब कोरिलेशन (r ≈ 0) होने का मतलब दो निवेशों का पूरी तरह स्वतंत्र होना नहीं है। उनके बीच गैर-रैखिक संबंध हो सकते हैं और बाज़ार में असाधारण उथल-पुथल के दौरान दोनों में एक साथ नुकसान भी हो सकता है।
पॉज़िटिव कोरिलेशन (r > 0) में रिटर्न एक ही दिशा में चलने की प्रवृत्ति दिखाते हैं। नेगेटिव कोरिलेशन (r < 0) में वे विपरीत दिशाओं में चलते हैं। वहीं ज़ीरो के करीब कोरिलेशन (r ≈ 0) स्पष्ट रैखिक संबंध न होने का संकेत देता है।
जिन निवेशकों के पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा पहले से ब्रॉड मार्केट ETF में लगा है, उनके लिए अलग रिटर्न पैटर्न वाले निवेश अतिरिक्त डाइवर्सिफिकेशन का विकल्प हो सकते हैं।
आखिर डाइवर्सिफिकेशन का लक्ष्य ऐसे निवेश ढूँढ़ना नहीं है जो हमेशा ऊपर ही जाएँ।
लक्ष्य ऐसा पोर्टफोलियो बनाना है जिसमें सभी निवेश एक जैसे मार्केट फ़ैक्टर पर निर्भर न हों।
3. शेयर और बॉन्ड होने के बाद भी अतिरिक्त डाइवर्सिफिकेशन क्यों ज़रूरी हो सकता है?
अगर आपके पास पहले से शेयर ETF और बॉन्ड फंड हैं, तो आप सोच सकते हैं कि क्या अतिरिक्त डाइवर्सिफिकेशन की वास्तव में ज़रूरत है।शेयर और बॉन्ड का संयोजन लंबे समय से निवेश पोर्टफोलियो बनाने का एक पारंपरिक तरीका रहा है।
शेयर लंबी अवधि में पूँजी बढ़ाने की संभावना देते हैं, जबकि अच्छी क्रेडिट क्वालिटी वाले बॉन्ड ब्याज से आय दे सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में पोर्टफोलियो की अस्थिरता कम करने में मदद कर सकते हैं।
लेकिन शेयर और बॉन्ड हमेशा एक-दूसरे के जोखिम की भरपाई नहीं करते।
महँगाई में अचानक बढ़ोतरी, ब्याज दरों में तेज़ बदलाव या बाज़ार में लिक्विडिटी की कमी होने पर दोनों एसेट क्लास एक साथ दबाव में आ सकते हैं।
इसका मतलब है कि शेयर और बॉन्ड का मिश्रण भी साझा आर्थिक जोखिमों को पूरी तरह खत्म नहीं करता।
इसीलिए कुछ निवेशक पारंपरिक एसेट क्लास के बाहर रिटर्न के अतिरिक्त स्रोत तलाशते हैं।
ऐसे कुछ विकल्प हैं:
- मार्केट-न्यूट्रल रणनीतियाँ (Market-Neutral Strategies): पूरे बाज़ार की दिशा पर पोर्टफोलियो की निर्भरता कम करने का प्रयास करती हैं।
- ट्रेंड-फॉलोइंग रणनीतियाँ (Trend-Following Strategies): अलग-अलग बाज़ारों में कीमतों के ट्रेंड पहचानकर ट्रेडिंग के अवसर तलाशती हैं।
- मल्टी-मार्केट क्वांटिटेटिव रणनीतियाँ: पूर्वनिर्धारित नियमों या सांख्यिकीय मॉडलों के ज़रिए कई वित्तीय बाज़ारों में ट्रेडिंग के अवसर पहचानती हैं।
- वैकल्पिक निवेश (Alternative Investments): ऐसे एसेट और रणनीतियाँ शामिल करते हैं जिनके रिटर्न पर पारंपरिक शेयरों और बॉन्ड से अलग फ़ैक्टर असर डाल सकते हैं।
ये रणनीतियाँ ETF या बॉन्ड से अपने-आप ज़्यादा सुरक्षित या लाभदायक नहीं हो जातीं।
हर वैकल्पिक निवेश का शेयर बाज़ार से कोरिलेशन कम हो, यह भी ज़रूरी नहीं है।
फिर भी कुछ रणनीतियाँ अध्ययन के योग्य हो सकती हैं, क्योंकि वे अलग ट्रेडिंग तरीकों, मार्केट अवसरों और जोखिम स्रोतों के आधार पर रिटर्न हासिल करने का प्रयास करती हैं।
सही एसेट एलोकेशन का मतलब ऐसा निवेश खोजना नहीं है जिसमें कभी नुकसान न हो। इसका मतलब ऐसा पोर्टफोलियो बनाना है जिसकी सफलता सिर्फ एक तरह की मार्केट परिस्थिति पर निर्भर न हो।
4. कम कोरिलेशन वाली रणनीतियाँ ETF पोर्टफोलियो का जोखिम कैसे घटा सकती हैं?
यहीं कोरिलेशन की असली उपयोगिता सामने आती है।पोर्टफोलियो का कुल जोखिम सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि हर निवेश में कितना उतार-चढ़ाव है।
यह भी मायने रखता है कि अलग-अलग निवेशों के रिटर्न एक-दूसरे से किस तरह संबंधित हैं।
मान लीजिए एक पोर्टफोलियो में दो एसेट हैं।
एसेट A एक ब्रॉड मार्केट ETF है। एसेट B शेयर बाज़ार से कम सहसंबंध वाली निवेश रणनीति है।
अगर एसेट B का अपेक्षित रिटर्न, जोखिम और लागत उचित हो, तो दोनों को सही अनुपात में मिलाने से पूरे पोर्टफोलियो की अस्थिरता कम हो सकती है।
क्यों?
क्योंकि दोनों निवेश एक ही समय पर बढ़ते या गिरते हों, यह ज़रूरी नहीं।
जब एक निवेश खराब प्रदर्शन करता है, तब दूसरा अपेक्षाकृत स्थिर रह सकता है या अलग रिटर्न पैटर्न दिखा सकता है।
इसी अंतर से डाइवर्सिफिकेशन का संभावित फायदा मिलता है।
एक आसान उदाहरण: डाइवर्सिफिकेशन से वोलैटिलिटी कैसे घटती है?
मान लीजिए एसेट A (ब्रॉड मार्केट ETF) और एसेट B (कम कोरिलेशन वाली रणनीति), दोनों की सालाना वोलैटिलिटी 20% है।यह भी मान लेते हैं कि एक ही अवधि में दोनों के रिटर्न के बीच कोरिलेशन शून्य है (ρ = 0)।
अगर पोर्टफोलियो का 50% एसेट A और 50% एसेट B में लगाया जाए, तो पूरे पोर्टफोलियो की सैद्धांतिक सालाना वोलैटिलिटी घटकर लगभग 14.1% हो जाती है, जबकि दोनों में से किसी एक एसेट को अकेले रखने पर यह 20% है।
यह चार्ट डाइवर्सिफिकेशन का एक काल्पनिक उदाहरण दिखाता है: भले ही एसेट A और B दोनों अंत में पॉज़िटिव रिटर्न दें, लेकिन बीच की अवधि में उनकी कीमतों में काफ़ी उतार-चढ़ाव हो सकता है। कम कोरिलेशन वाले निवेशों को मिलाने से समान अपेक्षित रिटर्न के साथ पोर्टफोलियो के मूल्य में अपेक्षाकृत कम उतार-चढ़ाव संभव हो सकता है।
इसे डाइवर्सिफिकेशन बेनिफिट (Diversification Benefit) कहा जाता है।
चार्ट में दिखाई गई ग्रोथ कर्व केवल समझाने के लिए हैं। ये किसी वास्तविक निवेश रणनीति की परफॉर्मेंस नहीं दिखातीं। वास्तविक परिणाम रिटर्न, बदलते कोरिलेशन, एसेट एलोकेशन, ट्रांज़ैक्शन कॉस्ट और अन्य जोखिमों पर निर्भर करते हैं। कम कोरिलेशन से मुनाफ़े की गारंटी नहीं मिलती।
बेहतर डाइवर्सिफिकेशन का मतलब ज़्यादा मुनाफ़े की गारंटी नहीं
अलग-अलग निवेशों को मिलाने के फायदे को कभी-कभी प्रतीकात्मक रूप से "1+1>2" कहा जाता है।लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दो एसेट में निवेश करते ही आपका रिटर्न दोगुना हो जाएगा।
संभावित फायदा अधिक व्यावहारिक है:
पोर्टफोलियो की कुल अस्थिरता कम रखते हुए लगभग समान अपेक्षित रिटर्न पाने की कोशिश करना।
इससे रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न (Risk-Adjusted Return) बेहतर हो सकता है। यह माप बताता है कि लिए गए जोखिम की तुलना में निवेश ने कितना रिटर्न दिया।
लंबी अवधि के निवेशकों के लिए सिर्फ कुल रिटर्न ही महत्वपूर्ण नहीं होता।
वोलैटिलिटी और मैक्सिमम ड्रॉडाउन (Maximum Drawdown) भी उतने ही महत्वपूर्ण संकेतक हैं।
कोई रणनीति लंबे समय में आकर्षक दिख सकती है, लेकिन तेज़ बाज़ार गिरावट के दौरान उसमें निवेश बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
अपने जोखिम सहने की क्षमता के अनुरूप पोर्टफोलियो बनाना लंबी अवधि की निवेश योजना पर टिके रहने में मदद कर सकता है।
5. ETF निवेशकों के लिए एसेट एलोकेशन के 3 तरीके
मान लीजिए ब्रॉड मार्केट ETF पहले से आपके पोर्टफोलियो का मुख्य हिस्सा हैं।आप लंबी अवधि के शेयर निवेश की संभावनाओं पर भरोसा करते हैं और बाज़ार के सामान्य उतार-चढ़ाव को स्वीकार करते हैं।
ऐसी स्थिति में कम कोरिलेशन वाली रणनीति जोड़ने का उद्देश्य ज़रूरी नहीं कि सबसे ज़्यादा रिटर्न कमाना हो।
इसका उद्देश्य शेयर बाज़ार की परफॉर्मेंस पर पूरे पोर्टफोलियो की निर्भरता कम करना भी हो सकता है।
आइए 3 संभावित पोर्टफोलियो की तुलना करें।
पोर्टफोलियो A: 100% ब्रॉड मार्केट ETF
यह तरीका सरल, पारदर्शी और आमतौर पर अपेक्षाकृत कम लागत वाला होता है।इससे आप उस शेयर बाज़ार की परफॉर्मेंस में सीधे हिस्सा लेते हैं जिसे आपका ETF ट्रैक करता है।
लेकिन पोर्टफोलियो का अधिकांश जोखिम शेयर बाज़ार से जुड़ा रहता है। बड़ी मार्केट करेक्शन के दौरान पोर्टफोलियो में भारी गिरावट आ सकती है।
पोर्टफोलियो B: ब्रॉड मार्केट ETF + बॉन्ड
इस तरीके में शेयरों के साथ एक अलग एसेट क्लास जोड़ी जाती है।अच्छी क्रेडिट क्वालिटी वाले बॉन्ड ब्याज से आय दे सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में पोर्टफोलियो की अस्थिरता कम करने में मदद कर सकते हैं।
लेकिन ब्याज दर का जोखिम, क्रेडिट रिस्क और शेयरों व बॉन्ड के एक साथ गिरने की संभावना बनी रहती है।
पोर्टफोलियो C: ब्रॉड मार्केट ETF + कम कोरिलेशन वाली क्वांटिटेटिव रणनीतियाँ
इस तरीके में नियम-आधारित ट्रेडिंग रणनीति जोड़ी जाती है, जिसका लक्ष्य ऐसा रिटर्न हासिल करना है जो शेयर बाज़ार की दिशा पर अपेक्षाकृत कम निर्भर हो।यदि रणनीति कम कोरिलेशन बनाए रखती है और उसका जोखिम-रिटर्न प्रोफ़ाइल उचित है, तो यह पोर्टफोलियो के डाइवर्सिफिकेशन को बेहतर बना सकती है।
हालाँकि क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग के अपने जोखिम हैं, जिनमें पूँजी का नुकसान, मॉडल की विफलता, लिक्विडिटी की समस्या, लेवरेज और ट्रेड एग्ज़िक्यूशन से जुड़े जोखिम शामिल हैं।
अतीत में कम कोरिलेशन होने से यह गारंटी नहीं मिलती कि गंभीर बाज़ार संकट के दौरान रणनीति आपके पोर्टफोलियो को नुकसान से बचा पाएगी।
इन 3 विकल्पों में से कोई भी हर निवेशक के लिए सबसे अच्छा नहीं है।
ये विकल्प एक-दूसरे के विरोधी भी नहीं हैं। आप शेयर, बॉन्ड और क्वांटिटेटिव रणनीतियों को एक ही पोर्टफोलियो में रखने की संभावना भी देख सकते हैं।
इस काल्पनिक तुलना में पोर्टफोलियो A (100% ब्रॉड मार्केट ETF) का मैक्सिमम ड्रॉडाउन −32%, पोर्टफोलियो B (ETF + बॉन्ड) का −24% और पोर्टफोलियो C (ETF + कम कोरिलेशन वाली रणनीतियाँ) का −18% दिखाया गया है।
यह उदाहरण बताता है कि रिटर्न के अलग-अलग स्रोत बाज़ार गिरने पर पोर्टफोलियो का नुकसान कम करने में कैसे मदद कर सकते हैं। लेकिन ये आँकड़े केवल काल्पनिक हैं, किसी वास्तविक निवेश रणनीति के प्रदर्शन के परिणाम नहीं। वास्तविक फायदे का मूल्यांकन ऐतिहासिक डेटा के आधार पर किया जाना चाहिए।
आपके लिए सही एसेट एलोकेशन आपके निवेश लक्ष्यों, जोखिम सहने की क्षमता, निवेश की समय-सीमा और पोर्टफोलियो में हर एसेट की भूमिका पर निर्भर करता है।
6. ETF पोर्टफोलियो में क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग की क्या भूमिका हो सकती है?
अगर आप पहले से ब्रॉड मार्केट ETF में निवेश करते हैं, तो अगला कदम एक और शेयर ETF खरीदना ही हो, यह ज़रूरी नहीं।शायद एक अलग सवाल ज़्यादा उपयोगी हो:
"क्या मेरे पोर्टफोलियो को ऐसे रिटर्न स्रोत से फायदा हो सकता है जिसे मुनाफ़ा कमाने के लिए शेयर बाज़ार का बढ़ना ज़रूरी न हो?"
यही निवेश दृष्टिकोण Mr.Forex अपनी क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग रणनीतियों के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहता है।
शेयर बाज़ार की दिशा से अलग रिटर्न के अवसर
Mr.Forex की क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग रणनीतियों का उद्देश्य पारंपरिक शेयर निवेश से अलग रिटर्न स्रोत प्रदान करने की कोशिश करना है।इन्हें परखने के लिए एक महत्वपूर्ण मापदंड है—रणनीति के रिटर्न और व्यापक शेयर बाज़ार के रिटर्न के बीच ऐतिहासिक कोरिलेशन।
अगर दोनों के रिटर्न की तुलना समान समयावधि और समान डेटा फ़्रीक्वेंसी पर की जाए, तो 0 के करीब कोरिलेशन यह संकेत देता है कि उस अवधि में रणनीति और शेयर बाज़ार के रिटर्न के बीच स्पष्ट रैखिक संबंध नहीं था।
इसलिए ऐसी रणनीतियाँ पारंपरिक शेयर ETF से अलग डाइवर्सिफिकेशन विशेषताएँ प्रदान कर सकती हैं।
लेकिन कोरिलेशन स्थिर नहीं रहता।
बाज़ार की परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। किसी रणनीति का अतीत में कम कोरिलेशन होने का मतलब यह नहीं कि भविष्य में भी वह वैसी ही रहेगी।
ETF को बदलना नहीं, बल्कि पोर्टफोलियो में सही पूरक जोड़ना
Mr.Forex का मानना नहीं है कि हर निवेशक को अपने मौजूदा ETF बेचकर पूरी पूँजी क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग में लगा देनी चाहिए।ETF लंबी अवधि के पोर्टफोलियो का मुख्य आधार बने रह सकते हैं।
क्वांटिटेटिव रणनीतियों को रिटर्न के संभावित अतिरिक्त स्रोत के रूप में परखा जा सकता है।
महत्वपूर्ण सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोई ट्रेडिंग रणनीति अकेले कितनी कमाई करती है।
असल सवाल यह है कि उसे मौजूदा ETF पोर्टफोलियो में जोड़ने से पूरे पोर्टफोलियो का जोखिम-रिटर्न संतुलन बेहतर होता है या नहीं।
इसका आकलन करने के लिए कुछ सवाल पूछिए:
- क्या पूरे पोर्टफोलियो की वोलैटिलिटी कम होती है?
- क्या मैक्सिमम ड्रॉडाउन घटता है?
- क्या रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न बेहतर होता है?
- क्या ट्रेडिंग कॉस्ट घटाने के बाद भी ये सुधार बने रहते हैं?
एसेट एलोकेशन में क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग की उपयोगिता समझने के लिए यही सवाल अधिक महत्वपूर्ण हैं।
क्वांटिटेटिव रणनीति में निवेश से पहले ये 4 आँकड़े ज़रूर देखें
चाहे आप Mr.Forex की रणनीतियों का मूल्यांकन कर रहे हों या किसी अन्य क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग प्रदाता का, सिर्फ कुल ऐतिहासिक रिटर्न देखकर फैसला लेना पर्याप्त नहीं है।इन 4 बातों पर ध्यान दें:
- शेयर बाज़ार के साथ कोरिलेशन: रणनीति के ऐतिहासिक रिटर्न शेयर बाज़ार के साथ कितना समान रूप से चले और अलग-अलग मार्केट परिस्थितियों में यह संबंध कितना स्थिर रहा।
- मैक्सिमम ड्रॉडाउन (Maximum Drawdown): पोर्टफोलियो के किसी उच्चतम मूल्य से उसके बाद के निचले स्तर तक दर्ज की गई सबसे बड़ी प्रतिशत गिरावट।
- रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न: लिए गए जोखिम की तुलना में रणनीति ने कितना रिटर्न हासिल किया।
- ऐतिहासिक परफॉर्मेंस की अवधि: क्या रणनीति अलग-अलग बाज़ार परिस्थितियों से गुज़री है और क्या सही मूल्यांकन के लिए पर्याप्त डेटा उपलब्ध है।
यह तय करने से पहले कि कम कोरिलेशन वाली रणनीति आपके पोर्टफोलियो में उचित होगी या नहीं, Mr.Forex पर उपलब्ध ऐतिहासिक परफॉर्मेंस और जोखिम के आँकड़े देखें।
उद्देश्य सिर्फ अधिक रिटर्न देने वाली रणनीति ढूँढ़ना नहीं, बल्कि यह समझना है कि वह आपके मौजूदा निवेशों के साथ मिलकर कैसा प्रदर्शन कर सकती है।
7. ETF और पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल 1: क्या ब्रॉड मार्केट ETF अपने-आप में पर्याप्त डाइवर्सिफाइड नहीं होता?
ब्रॉड मार्केट ETF कई कंपनियों में निवेश फैलाकर कंपनी-विशेष जोखिम कम करता है।लेकिन वह पूरे शेयर बाज़ार की गतिविधियों से प्रभावित होता रहता है।
अधिक डाइवर्सिफिकेशन चाहने वाले निवेशक बॉन्ड या कम कोरिलेशन वाले अन्य निवेशों का मूल्यांकन कर सकते हैं और देख सकते हैं कि इससे पोर्टफोलियो का कुल जोखिम कितना बदलता है।
सवाल 2: निवेश में ज़ीरो कोरिलेशन का क्या मतलब होता है?
ज़ीरो कोरिलेशन का मतलब है कि दो एसेट के रिटर्न के बीच कोरिलेशन कोएफिशिएंट 0 के करीब है।यह दर्शाता है कि उनके ऐतिहासिक रिटर्न के बीच कोई स्पष्ट रैखिक संबंध नहीं है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों निवेश पूरी तरह स्वतंत्र हैं या उनमें नुकसान नहीं हो सकता।
सवाल 3: क्या ज़ीरो कोरिलेशन, नेगेटिव कोरिलेशन से बेहतर है?
ज़रूरी नहीं।नेगेटिव कोरिलेशन वाले निवेश कुछ मार्केट नुकसान की अधिक सीधे भरपाई कर सकते हैं, लेकिन उनका आपसी संबंध बदल सकता है।
वहीं 0 के करीब कोरिलेशन वाले निवेश अलग रिटर्न स्रोत उपलब्ध करा सकते हैं।
दोनों का मूल्यांकन अपेक्षित रिटर्न, वोलैटिलिटी, लागत और असाधारण बाज़ार परिस्थितियों के जोखिम के आधार पर होना चाहिए।
सवाल 4: क्या क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग रणनीतियाँ हमेशा शेयर बाज़ार से असंबंधित होती हैं?
नहीं।क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग में पूर्वनिर्धारित नियमों, सांख्यिकीय मॉडलों या एल्गोरिदम के आधार पर ट्रेडिंग निर्णय लिए जाते हैं।
रणनीति की बनावट के अनुसार उसका शेयर बाज़ार के साथ पॉज़िटिव, नेगेटिव या कम कोरिलेशन हो सकता है।
वास्तविक कोरिलेशन का पता ऐतिहासिक रिटर्न डेटा से लगाना चाहिए।
सवाल 5: क्या कम कोरिलेशन वाली रणनीति जोड़ने से पोर्टफोलियो का जोखिम हमेशा घटता है?
नहीं।इसका प्रभाव रणनीति की अपनी वोलैटिलिटी, मौजूदा निवेशों के साथ उसके कोरिलेशन, पोर्टफोलियो में उसके एलोकेशन और मार्केट परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
बहुत अधिक उतार-चढ़ाव वाली रणनीति, शेयर बाज़ार से कम कोरिलेशन होने के बावजूद, पूरे पोर्टफोलियो का जोखिम बढ़ा सकती है।
सामान्य बाज़ार परिस्थितियों में कम वोलैटिलिटी होने से भी असाधारण संकट के दौरान बड़े नुकसान से सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती।
सवाल 6: क्या ETF निवेश के साथ क्वांटिटेटिव कॉपी ट्रेडिंग की जा सकती है?
कुछ निवेशकों के लिए यह उपयुक्त हो सकता है, लेकिन यह उनकी व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति, निवेश लक्ष्य और जोखिम सहने की क्षमता पर निर्भर करता है।क्वांटिटेटिव कॉपी ट्रेडिंग में किसी दूसरी ट्रेडिंग रणनीति के सौदों की नकल की जाती है। इससे अलग रिटर्न स्रोतों तक पहुँच मिल सकती है, लेकिन पूँजी का नुकसान, ट्रेड निष्पादन में अंतर और रणनीति विफल होने जैसे जोखिम भी होते हैं।
निवेश करने से पहले रणनीति की कार्यप्रणाली, ट्रेडिंग शर्तों और संबंधित जोखिमों को अच्छी तरह समझना ज़रूरी है।
मुख्य सवाल यह नहीं है कि आपके पास पहले से ETF हैं या नहीं।
असल सवाल है कि क्या अतिरिक्त रणनीति आपके पूरे पोर्टफोलियो में वास्तविक डाइवर्सिफिकेशन का लाभ दे सकती है।
निष्कर्ष: असली डाइवर्सिफिकेशन सिर्फ और ETF खरीदने से नहीं होता
ब्रॉड मार्केट ETF लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के लिए कई निवेशकों का एक उपयोगी आधार बने रह सकते हैं।लेकिन सैकड़ों कंपनियों के शेयर रखना और कई अलग रिटर्न स्रोतों वाला पोर्टफोलियो बनाना एक ही बात नहीं है।
पहला तरीका शेयर बाज़ार के भीतर जोखिम फैलाता है।
दूसरा तरीका पूरे पोर्टफोलियो की साझा मार्केट रिस्क पर निर्भरता कम करने की कोशिश करता है।
शेयर, बॉन्ड और कम कोरिलेशन वाली क्वांटिटेटिव रणनीतियाँ, तीनों की भूमिका अलग हो सकती है।
ज़रूरी नहीं कि एक निवेश को दूसरे की जगह लेना पड़े।
मुख्य बात यह समझना है कि क्या सही संयोजन से जोखिम और अपेक्षित रिटर्न के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।
समझदारी से एसेट एलोकेशन करने का मतलब सिर्फ सबसे ज़्यादा रिटर्न वाला निवेश खोजना नहीं है। इसका मतलब ऐसे निवेशों का संयोजन बनाना है जो आपकी जोखिम सहने की क्षमता के अनुरूप हो और लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करे।
अगर ब्रॉड मार्केट ETF पहले से आपके पोर्टफोलियो की नींव हैं, तो ऐसी रणनीतियों का अध्ययन करना उपयोगी हो सकता है जिनका प्रदर्शन पूरी तरह शेयर बाज़ार की दिशा पर निर्भर नहीं होता।
जानें, कम कोरिलेशन वाली रणनीतियाँ आपके ETF पोर्टफोलियो में क्या जोड़ सकती हैं
Mr.Forex की क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग रणनीतियों, उनके ऐतिहासिक प्रदर्शन, शेयर बाज़ार के साथ कोरिलेशन और प्रमुख जोखिम संकेतकों के बारे में जानें।मूल्यांकन करें कि रिटर्न का एक अलग स्रोत आपके मौजूदा ETF निवेशों का उपयोगी पूरक बन सकता है या नहीं।
जोखिम संबंधी चेतावनी: यह लेख केवल वित्तीय शिक्षा और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे व्यक्तिगत निवेश सलाह या किसी निश्चित रिटर्न अथवा मुनाफ़े की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए। सभी काल्पनिक और सिमुलेटेड आँकड़े केवल निवेश संबंधी अवधारणाएँ समझाने के लिए दिए गए हैं; ये किसी भी ट्रेडिंग रणनीति की वास्तविक परफॉर्मेंस नहीं दर्शाते। पिछली परफॉर्मेंस और कोरिलेशन कोएफिशिएंट भविष्य के परिणामों की गारंटी नहीं देते। क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग और कॉपी ट्रेडिंग में निवेश की गई पूँजी का कुछ हिस्सा या पूरा हिस्सा खोने का जोखिम रहता है। निवेश करने से पहले संबंधित रणनीति, ट्रेडिंग शर्तों, लागू शुल्क और संभावित जोखिमों की सावधानीपूर्वक जाँच करें।